इतरा लो तुम अपनी ऊंचाई पे
पर कभी हिमालय को देखा है?
आगोश में ले अपनी बाहों में
जाने कबसे हमें लिए बैठा है।
हो भले कितने गंभीर और धीर
पर कभी धरती का सोचा है?
हर सितम की गवाहगार जिसने
सच झूठ को समाये रखा है।
इतरा लो तुम अपनी ऊंचाई पे
पर कभी हिमालय को देखा है?
आगोश में ले अपनी बाहों में
जाने कबसे हमें लिए बैठा है।
हो भले कितने गंभीर और धीर
पर कभी धरती का सोचा है?
हर सितम की गवाहगार जिसने
सच झूठ को समाये रखा है।
कभी जली थी मोमबत्तियां
कभी किसी बेटी के लिए
कहीं जलता है शहर
कभी किसी ढोंगी के लिए।
कभी लगा था है दम
उन नेताओं के वादों पर
कभी लगता है , हैं बेदम
वो अपनी कुर्सी के लिए।
कभी उठा था गुबार
क्रोध में सभी का समान सा
आज वो ठंडा है बर्फ है
बदला से है सभी के लिए।
अंत मे बस कहता हूं
सुन लो बात आगे के लिए
सौदा करके इज्जत का
न भीख माँगना गद्दी के लिए।
-विशाल "बेफिक्र"
सफर लंबा हो चाहें कितना भी, कट ही जाता है
इंतज़ार बस उस हमनवा हमसफर का रहता है
सूना से ये जहां सभी का भर ही जाता है
इनकार जब हसीं इक़रार में बदल जाता है
जग उजला पग -पग उजला
चहुँ ओर किरण सा छाते हैं
कहो कि हम अब आते हैं
अंधकार की काली रातों में
एक नन्हा सा दीप जलाते है
कहो कि हम अब आते हैं
दिन रात जलते निस्वार्थ दीपक से
जीवन उपवन सा कर जाते हैं
कहो कि हम अब आते हैं
हक़ है किसका कितना ,हमको क्या?
हम कर्तव्यों पे ही मर मिट जाते हैं
कहो कि हम अब आते हैं
विषम परिस्थितियों में भी हम
एक जीने की राह सुझाते हैं
कहो कि हम अब आते हैं
हम भारत की संतानें हैं नामों में क्या?
कि हम शक्तिपुत्र भी कहलाते हैं
कहो कि हम अब आते हैं
नित नवीन खोजों से हो अवगत
सब बस एक नाम हो जाते है
हम एनटीपीसी कहलाते हैं
हम एनटीपीसी कहलाते हैं
झुलसा है ये बदन कि अब
बूंदों का मरहम लग जाने दो
थपेडे सहे हैं जो लू के अब
इन बौछारों से सहलाने दो
ऊबा से है मन इस खुश्की से
उन्मत्त पवन को रिझाने दो
खोया सा यौवन है उपवन का
कुछ तो नव जीवन भर जाने दो
जलता सुलगता सा आसमां
थोड़ा खुशगवार तो हो जाने दो
जीर्ण शीर्ण ये मन तन जीवन
कुछ तो नव शक्ति भर जाने दो
बिछड़े से बिखरे से त्रस्त परिंदों को
अब तो मस्त मगन हो जाने दो
प्यासी है नदियां झरने भी है खाली
जल की धारा को बह जाने दो
सोया है जहान गहरी सी नींद में
अब तो इसकी आंखें खुल जाने दो।
-विशाल "बेफिक्र"
क्या मजा सुकून का?
क्या समझोगे तुम?
हजार मुश्किलें झेली है मैंने
इस हसीं मंजर के लिए।
जानोगे क्या खुलापन ?
क्या समझोगे हमे?
पहाड़ बंदिशों का तोडा
है इस आज़ादीे के लिए।
बुरा वक़्त भी क्या था?
कैसे समझोगे भीे तुम?
हर वक़्त निहारी है घडी
उस वक़्त के जाने के लिए।
उठना है क्या गिरने के बाद?
कैसे समझाऊं तुम्हे?
रगड़ा हूँ मैं अपने घुटनों पर
तरसा हूँ उठने के लिए।
चेहरे पे मेरे आयी उस ख़ुशी को मत देख
दिल में उठे दर्द को छुपाता हूँ
एक दरिया है जिसे सुखाता हूँ
एक तूफ़ान है जिसे थाम आता हूँ
एक आग है जिसे बुझाता हूँ।
मत पूछो कि नाराज़ सा था क्यों अब तलक
अपनी ख्वाहिशों को दबाता हूँ
इन बंदिशों को अपनाता हूँ
अपनी मनमानी को भुलाता हूँ
मर मर के भी जिए जाता हूँ।
क्यों किसी दायरों में समेटते हो तुम
मेरा दिल दरिया है सभी के लिए
क्यों मंदिर मस्जिद पे बिफरे जैसे कोई
ये जरिया है मुझ तक पहुंचने के लिए
अगर चलो कहीं
निशान बनाते चलो
पैरों के निशाँ नहीं
दिल हथियाते चलो ।
ज़िन्दगी नज़्म है इसे
गुनगुनाते चलो
बहुत रह लिए अजनबी
हमसफ़र बनाते चलो ।
बुरा वक्त सही वक्त
न ऐसे ढर्रे में ढलो
कैसा भी हो तेरा है ये
वक़्त अपनाते चलो ।
राहों में उलझे हो ऐसे क्यों
मंजिलें पाते चलो
जब लगे जी न वहां पर
नयी राहें ढूंढते चलो ।
अब तेरी वफाई की
जरूरत है किसे ?
जब बेवफाई से तेरी जैसी
मुहब्बत सी हो गयी है।
अपने दूजे यार संग
यूँ जलाते हो किसे?
जब परवाने को जल जाने की
आदत सी हो गयी है।
बार बार लिख मेरा नाम
मिटाते हो क्यों?
जब खुद तुझपे कुर्बान करने की
चाहत सी हो गयी है।
हंसती हो मेरे हाल पे ऐसे
क्यों हो इतना बेकदर?
कल ही तो हम 'हम' थे अब
गैरत सी हो गयी है।
कभी मेरे बाँहों में गुजरी थी
वो शामें अब क्यों?
अब मिल जाएं नज़रें तो क्यों
क़यामत सी हो गयी है।
क्यों यूँ तुम इतना बेचैन से हो
कौन सी आज़ादी छिन रही है
सुनते थे शहीदों की दास्ताँ क्यों
फिर वो आज़ादी थी किसलिए
फिर वो क़ुरबानी थी किसके लिये?
अरे पूछों ज़रा उस दीपक से
जो रात भर जला किसलिए
तनहा सा एकांत सा सुबकता सा
सुबह तक न नसीब फिर उसको
जागा वो बेवजह था किसके लिए?
रात के सन्नाटे का खौफ है क्या?
क्या जानोगे तुम सोते हुए
आँखों से नींद भुला सहमे उनसे पूछो
बितादी ज़िन्दगी गुलामी सहते हुए
सुबह हो दोपहर या दिन का कोई पहर
खड़ा है वो सीमा पर हम तभी बेफिकर
न कर सको उसका प्रोत्साहन तुम अगर
करना न शीश नीचे तुम उसका इस कदर
बंदिशें तोड़ हो जा अब आज़ाद
कि ज़माना सो रहा है
मंज़िलें और होगी कैसे फौलाद
यूँ रास्ता तू खो रहा है
जब बेगुनाह बन बेपरवाह क्यों
गुनाहगार हो रहा है
जब है सिंह तो कर दहाड़
यूँ गीदड़ सा डर रहा है
तू है सागर तो जा जाकर क्यों
नदियों सा बह रहा है
तूफानों के बाद भी बचा वटवृक्ष
क्यों पौधों सा मर रहा है
सूर्य सा प्रकाशित है फिर तारों
को क्यों गिन रहा है
यौवन का संचार है फिर क्यों जीवन
वृद्धों का तू जी रहा है
तू गगन अपार है क्यों इस देह
में यूँ खुद सिमट रहा है
काल भी डरेगा तुझसे क्यूँ वक़्त का
यूँ मोल कर रहा है।
हवा बहुत तेज़ चल रही थी। सूरज भी अपनी सारी ताक़त झोंक के थका हारा अपने घर की तरफ बढ़ चला था। खुले आकाश की जगह अब काले घनघोर बादलों ने ले ली थी। बल्लू के लिए ये सब कोई कयामत से कम न था। खेत में खड़ी उसकी गेंहूँ की फसल बस शायद इंतज़ार कर रही थी अपनी तबाही का। बल्लू असहाय सा खड़ा बस मौन होके इस मंजर के टल जाने की भगवन से गुहार कर रहा था। बल्लू की इस बार की फसल पूरे गाँव में सबसे अच्छी हुई थी। गेंहूँ का दाना भी वजनीला था। बल्लू को अपनी मेहनत का फल बस मिलने ही वाला था। उसके भी शायद 'अच्छे दिन' आने को थे। घर में उसकी पेट से बीवी ने भी अपने आने वाले बच्चे के अच्छे से लालन पालन के सपने देख रखे थे। पर आज किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। बल्लू के सपने शायद सपने ही रह जाने वाले थे। बल्लू ने सोच रखा था कि इस बार एक फसल अच्छे से हो जाये तो आढ़ती का सारा पैसा सूद समेत चूका दूंगा। फिर शायद क़र्ज़ लेने की नौबत ही न आये। तभी आसमान में देखते हुए उसे पानी की एक बूँद सीधे उसके माथे पे पड़ती है। हाय! ये पानी की बूँद नहीं 'ओला' था । फिर क्या था तड़ तड़ की आवाज़ और सारी फसल जमीन पर । और इसी के साथ बल्लू के अरमान सपने सब बिखर गए। बचा था तो एक शोर जो हर खेत हर घर से आ रहा था। हे भगवान ये क्या हो गया? बल्लू जिस पेड़ के नीचे बैठा था शायद उस पेड़ में कुछ चुम्बकत्व था या बल्लू के अंदर उठने की चाह मर गयी थी की वो बैठा का बैठा रह जाता है। वो भगवान् को कोसते हुए कि एक दिन की भी मोहलत दे देता तो वो रात रात में सारी फसल काट के घर में रख लेता। पर सच्चाई यह थी की बल्लू बर्बाद हो चूका था। उसका सरकार से तो पहले ही विश्वास उठ चुका था, आज ईश्वर से भी उसका नाता टूट गया था। अरमानों की चिता जला के वो मन से टूटा ह्रदय से दुखी हो कर अपने घर को चल देता है जहाँ उसके जैसी ही हालत वाली उसकी बीवी अपने पति का इंतज़ार कर रहि थी।
कल्लू ने मार्किट से नया एंड्राइड मोबाइल फ़ोन अभी खरीद भर था। सालों से कीपैड की बटने दबा दबा कर उसका एक्यूप्रेशर हो रहा था। पर उसको वो आनंद नहीं मिल रहा था। खुश तो था बड़ी मुश्किल से जाने कितनी हजामत और बाल काटने के बाद जो रकम उसने जोड़ी थी आज उसका फल था ये एंड्राइड फोन। उसके घर में आज जश्न का माहौल था। बीवी और चार छोटे बड़े बच्चे खुश थे की आज कल्लू मियां कुछ ऐसा ला रहे हैं जो उनकी किस्मत बदल देगा। कल्लू ने बाजार जाते वक़्त ही इसका संकेत दे दिया था कि आज रात को मुर्गा बना लेना। घर में बीवी की ये ख़ुशी भी शायद शादी के बाद पहली बार आयी थी। कल्लू उस फोन को बड़े एहतियात से घर में ला रहा था। फेसबुक गूगल यूट्यूब न जाने क्या क्या उसके दिमाग में चले जा रहा था। भगवान ग़रीबों के घर खुशियां कुछ ज्यादा ही ज़ोर से लाता है या शायद गरीब थोड़ी सी खुशी में ही अपना सारा जहाँ ढूँढ लेता है। मन में खुशियों की बहार उमड़ पड़ी थी कल्लू के। कल्लू घर का दरवाजा खटखटाता है। वो मुर्गे की खुशबू जो घर के रसोई से आ रही थी , को दरवाजे की दरख़्त से सूंघ पा रहा था। दरवाजा खुलता है। छोटा बेटा पापा क्या लाये कहके लिपट जाता है। इतने में कल्लू के हाथ से वो फोन छिटक जाता है और फोन सीधा ज़मीन से टकराके छिन्न भिन्न हो जाता है। कल्लू को याद आता है कि दूकानदार कुछ टेम्पर्ड ग्लास लगाने की बात कर रहा था, जो वो चाँद रुपये बचाने के लिए मना कर देता है । अब घर में किसी के मरे सा सन्नाटा था। बीवी जब तक उस फोन को ठीक से निहार पाती वो दम तोड़ चूका था। अरमानो की इस कदर अर्थी उठते देख वो टूट के रो पड़ती है। जाके रसोई में मुर्गे को पकाने लग जाती है। इधर कल्लू हक्का बक्का खड़ा होके अपने सपनों को टूटते देखता रहता है। बीवी आती है सभी को मुर्गे को परोस के कोने में जाकर फिर फुट के रो पड़ती है। मुर्गा बहुत स्वाद था पर कोई एक दुसरे को बता नहीं पता है।
भगवान् गरीबों पे कुछ ज्यादा जल्दी खफा भी हो जाता है। ये शायद कल्लू को पता चल गया था।
तेरी हर ख़्वाहिश को पूरा करने
को ये दिल चाहता है
तुझसे मुहब्बत की आजमाइश
को ये दिल चाहता है
मुकम्मल जहाँ तब होगा नसीब
ऐ मेरे यार अपना तो
जब तेरी हर दुआ में ज़िक्र अपना
भी ज़रा सा आता है
अश्क़ तेरे जो बहें किसी बात पर
दम निकलता है इधर भी
उन तेरे चंद अश्कों की खातिर दुनिया
हिलाने को जी चाहता है
काँटों की चुभन
तब सोच के
तोड़ते हो
न तुम फूल।
बस यही स्वार्थ है जब
टूटन की
उस पीड़ा
को जाते हो भूल।।
मुझको मिला
क्या नहीं मिला?
गुर्राते हो जब
इस बात पे हुज़ूर
बस यही क्रोध भाव है
दरिद्र और दलिद्र
उस रोष
का किसे देवें कसूर।।
ज़माना बदला है
सोचते हो जब
बदल गए
हैं सारे रिश्ते नाते
बस यही विकार है जब
खुद कोई
कैसा भी
रिश्ता न तुम निभाते।।
-विशाल "बेफिक्र"
मधुर मधुर संगीत है ये
या चिड़ियों की चेहचाहर है
सिन्दूर- श्रृंगार है धरती का
या सूर्य-किरण का आकार है।
कलकल घुंघरू सा बजे ये
या नदी के पानी का बहाब है
मस्त यूँ होकर 'बेफिक्र' सा
या मदमस्त पवन का गुबार है।
महकता चहकता ये यौवन सा
या उपवन में फूलों की बयार है
रूठता मनवाता कोई बालक सा
या मौसम की बदलती बहार है।।
सुलगता जलता ये कोयले सा
या सूरज का बढ़ता ये ताप है
हर दिन नित्य ये वही घटना सा
ये प्रकृति का क्रिया-कलाप है।।
विशाल "बेफिक्र"
अब कहाँ वो
होगा सावन
अब कैसा ये
होगा यौवन
तुम जब
छोड़ गए
यूँ तोड़ गए।।
अब कौन
रहेगा खेवनहार
अब कैसे
हो नैया ये पार
तुम जब
छोड़ गए
मुंह मोड़ गए।।
मेरा क्या मैं तो
अब जी ही लूंगी
बहते इन आंसू को
अब पी ही लूंगी
तुम को क्या?
तुम जब
छोड़ गए
झकझोर गए।।
उस माँ का क्या अब
दोगे हिसाब
उस बाप को क्या अब
दोगे जवाब
तुम जब
छोड़ गए
किस ओर गए।।
मुझको क्या मिला मैंने
सब है खोया
सीमा पर जिसका सुहाग
हैं यूँ सोया
बाकी को क्या?
तुम जब
छोड़ गए
यूँ खो गए।।
माना कि मौत तो
आनो है सब को
पर क्या सही समय था
ये पूछूँगी रब को
इतनी जल्दी क्यों?
तुम जब
छोड़ गए
मुंह मोड़ गए।।
-विशाल "बेफिक्र"
महफ़िल में ऐ दोस्त दिल को मिला
तभी आराम था
जब मुहब्बत से तेरी निगाहों का आया
इधर पैगाम था।
शोर था शबाब था वहां शराब
का इंतज़ाम था
बस आपके ही इस तरफ देखने
भर का काम था।
जूनून सा छाया था मुझ पर इस जी
को क्या आराम था
बहका सा फिर रहा था मैं न लिए
कोई जाम था।
रोके न रुक रहा था जैसे दिल को
पहुँचाना कोई पैगाम था
तेरी अदा तेरे हुस्न के सिवा आँखों को
न कोई और काम था।
महफ़िल में ऐ दोस्त दिल को मिला
तभी आराम था
जब मुहब्बत से तेरी निगाहों का आया
इधर पैगाम था।
विशाल"बेफिक्र"
हकीकत से हो जब रूबरू
खुदी से जब हो न खफा
कर तू तब फैसले ऐ दिल
क्या वफ़ा ? क्या बेवफा?
जूनून जब सर पे हो न चढ़ा
सुकून जब तक न मिला
होना तू न बेसबर ऐ दिल
मत करना तू कोई सिला।
हो मजबूर या कोई गुरूर हो
चाहे किस्सा भी हो कोई सुना
चलना न तू उस डगर ऐ दिल
सफ़र हिफाज़त न हो सौ गुना।
कर उम्मीद खुद पे यकीन रख
कोशिश को अपना बना हथियार
जिसको तू न पा सका ऐ दिल वो
पायेगा तुझे , तू बस रहना तैयार।
-विशाल "बेफिक्र"
सुबह की पहली उजली किरण सा तुम
कोई एहसास हो
गगन में छाई हुई उस लालिमा का तुम
कोई प्रकाश हो।
सर्दी की ठिठुरन से उठी कंपकंपी का
कोई आभास हो
नदी की इठलाती जलधारा देख मन में
उठी सी प्यास हो।
शाखा से लिपटी हुई उस हरित पत्ती सा
कोई लिबास हो
धरती के सीने पे बलखाती कोई मेनका का
नृत्य रास हो।
अतीत की उस अनलिखी किताब का तुम
कोई प्रयास हो
भविष्य को निहारती अनभिज्ञ नियति का तुम
कोई कयास हो।
- विशाल "बेफिक्र"
ढूंढता निशान मैं उस
हसीं चमन का
सींचा था बागबाँ ने गुल
जो वतन का।
खोया है जोश , है आभूषण
जो यौवन का
कैसे सांस ले कि , जब
माहौल है दमन का
विशाल"बेफिक्र"
अजीब सी हैं उलझने
अजीब सा समाधान है
जिस मंजिल को तलाशता है तू
क्यों राहें उससे अंजान है।
क़भी ढंग से तो कभी बेढंग ही
काटता तू चट्टान है
जिस मूरत को तराशता है तू
उस बुत में भी क्या जान है।
अकाल काल बनकर यूँ सबके
सिर पे विद्यमान है
दो रोटियों न होती हैं नसीब वो
कौन सा संविधान है।
जिस मंजिल को तलाशता है तू
क्यों राहें उससे अंजान है।
विशाल "बेफिक्र"
हर गली नुक्कड़ चौराहे पे
ये अब आम है
जिधर भी देखता हूँ मैं हर ओर
क़त्ल-ए-आम है।
कहीं सुबह है सहमी सी कही
डरी सी शाम है
इंसानियत को देते ये लोग न जाने
कौन सा पैगाम हैं।
कभी दबी कभी रुकी सी आज
सबकी जबान है
अब क्यों रोती हुई सी लगती ये
कौन सी अजान है।
मासूमियत को रौंदते वो कौन जो
कुर्बान हैं
गुनाहों को जीते हैं न कसते इनपे
कोई लगाम हैं।
हर गली नुक्कड़ चौराहे पे
ये अब आम है
जिधर भी देखता हूँ मैं हर ओर
क़त्ल-ए-आम है।
- विशाल "बेफिक्र"
बेबस हूँ
लाचार हूँ
या इनका ही प्रकार हूँ।
उद्वेलित हूँ
आक्रोशित हूँ
या प्रतिशोध का शिकार हूँ।
विचलित हूँ
भयभीत हूँ
या सत्य से दो चार हूँ।
शोषित हूँ
कुष्ठित हूँ
या खुद ही व्यभिचार हूँ।
विचित्र हूँ
विक्षिप्त हूँ
या मन का कदाचार हूँ।
विरक्त हूँ
निशक्त हूँ
या कायरता का भण्डार हूँ।
रुग्ण हूँ
विकार हूँ
या बुराइयों का संसार हूँ।
भाव हूँ
बहाव हूँ
या मस्तिष्क का अधिभार हूँ।
-विशाल "बेफिक्र"
शहीद नाम न दो
तुम अपनी असफलताओं का
ये रक्त बहता है
न कि रंग किसी त्यौहार का ।
वतन पे मिटता हूँ मैं
ये बलिदान नही मेरे गुनाहों का
बेवक़्त तनहा मरता हूँ
जहाँ न संग मेरे परिवार का ।
प्रहरी हूँ मैं तो क्या?
मेरी भी एक छोटी सी ज़िन्दगानी हैं
आदि अंत कुछ भी हो
जीवन पृष्ठ पे मेरी भी एक कहानी है।
विशाल "बेफिक्र"
किसी शामत का डर
नहीं है मुझको
मैं तो तेरी उस रुस्बाई
से डरता हूँ।
किसी ईमारत की ख्वाइश
नहीं है मुझको
मैं तेरे इस ताज-ए-हुस्न
पे मरता हूँ।
किसी इबादत की जरूरत
नहीं है मुझको
मैं तेरे चेहरे की आयत
को पढता हूँ।
किसी अदालत से तस्दीक चाहिए
नहीं है मुझको
मैं तेरे नज़रों के इन फैसलों
को सुनता हूँ।
किसी क़यामत का खौफ
नहीं है मुझको
मैं तेरी बस एक बेवफाई
से डरता हूँ।
विशाल "बेफिक्र"
किंचित हूँ
लेकिन इस हाल पर
चिंतित हूँ
वंचित हूँ
लेकिन अप्राप्त पर
अचंभित हूँ
खंडित हूँ
लेकिन हुए विनाश से
चकित हूँ
रिक्त हूँ
लेकिन परिपूर्णता से
सिंचित हूँ
विक्षिप्त हूँ
लेकिन चित्त से
संतुलित हूँ
संलिप्त हूँ
लेकिन इस दौर से
वियुक्त हूँ
आसक्त हूँ
लेकिन भवसागर से
मुक्त हूँ
-विशाल "बेफिक्र"
अर्थ अनर्थ
हो जायेगा यदि
करते नहीं जो
कर सकते यद्यपि।
कारण अकारण
में बदल जायेगा यदि
करते नहीं प्रबंधन जो
कर सकते यद्यपि।
शांत अशांत
हो जायेगा यदि
करते नहीं सुनियोजित जो
कर सकते यद्यपि।
निर्विरोध विरोध
हो जायेगा यदि
करते नहीं निपटान जो
कर सकते यद्यपि।
सुख दुख
हो जायेगा यदि
करते नहीं अनवरत श्रम जो
कर सकते यद्यपि।
प्रेम द्वेष
हो जायेगा यदि
करते नहीं दूर बैर जो
कर सकते यद्यपि।
सम्मान अपमान
हो जायेगा
करते नहीं मंथन जो
कर सकते यद्यपि।
-विशाल "बेफिक्र"
मैं निकला सुबह सुबह
चाय पीने को
दुकान पहुँच आर्डर दिया
चाय लाने को
तभी पड़ी मेरी नज़र
अखबार पर
खबर थी बाल मज़दूरों की
रिहाई पर
अखबार पढ़ के मेरा
पारा हुआ गर्म
बाल मजदूरी कराते है इन्हें
आती नहीं शर्म
बच्चे तो स्वयं भगवान का
रूप होते हैं
फिर क्यों ये लोग भगवान से
दूर होते हैं
जिन हाथों में किताब
होनी चाहिए
क्यों उन पर जिम्मेदारी का बोझ
दे देते हैं
बच्चे तो इस देश का
भविष्य है
क्यों ये लोग इस बात से
अनभिज्ञ है
पढ़ते पढ़ते मेरा ध्यान गया
चाय पर
कहाँ मर गया ये "छोटू" अब तक
चाय क्यों नहीं लाया।
-विशाल "बेफिक्र"
तेरा चेहरा ज्यों देखा
मैं सो न सका तबसे।
तेरी आँखें जब से देखी।
मैं कुछ देख न सका तबसे
तेरा दीदार-ए-हुस्न क्या हुआ
मैं खुद कोरोक न सका तबसे।
तेरी बातें जब से सुनी
मैं कुछ कह न सका तबसे।
तेरी जुल्फ़ें जबसे खुलीं
मैं भूल गया सब तबसे।
तेरी अदाएं जब से बढ़ीं
मैं कैसी उम्मीद मैं हूँ तबसे।
तेरा मिलना क्या हुआ
मैं तनहा था लगा क्यों बरसों से।
विशाल "बेफिक्र"
सोता हूँ मैं तो
नींद कहीं खो जाती है
उस गुजरे कल को
वो फिर से जी आती है
वक़्त का पहिया
भी थम जाता है
अतीत की ऐसी हवा
मैं जी आता हूँ
गिले शिक़वे कहीं
टटोल आता हूँ।
होता हूँ मैं यहीं पर
कहीं खो जाता हूँ
क्या सच या झूठ में
उलझ जाता हूँ
अपने होशोहवाश
कहीं खो जाता हूँ
उन रास्तों में कुछ
अपना सा पाता हूँ
इन मंजिलों में खुद को
वीरान पाता हूं।
चलता तो हूँ मैं पर
कहीं ठहर जाता हूँ
पाँवो में बेड़ियों से
जकड़ा हुआ पाता हूँ
रुकने की चाह पर भी
चला जाता हूँ
चलकर भी क्यों कुछ
पा नहीं पाता हूँ
रूककर ही न जाने क्यों
आसमान पाता हूँ।
-विशाल "बेफिक्र"
चलने की और
तमन्ना होती
गर पैर डगमगाये
न होते ।
नज़र मंजिल की
ओर होती
गर रास्ते दिखाई
दिए होते ।।
-विशाल "बेफिक्र"
जहाँ राम नाम न हो
जहाँ पूजा पाठ का काम न हो
जहाँ संस्कार न हो
जहाँ किसी का सत्कार न हो
हे भगवान ! हे प्राणनाथ !
नहीं चाहिए। नहीं चाहिए।
जीवन तो हो पर प्राण न हो
सांस तो ले पर दम निकले
जागना तो हो जाग्रति न हो
काम तो हो पर नाम न हो
दिल तो हो जान न हो
हे प्रभु ! हे ईश्वर !
नहीं चाहिए। नहीं चाहिए।
सपना तो हो पर पूरा न हो
उम्मीद तो हो पर आशा न हो
प्यार तो हो पर प्रेम न हो
दोस्त तो हो पर साथी न हो
जहाँ दर्द तो हो ख़ुशी का आगमन न हो
हे स्वामी! हे पालनहार !
नहीं चाहिए ऐसा संसार !
नहीं चाहिए ऐसा संसार !
-विशाल "बेफिक्र"
जीने की वजह क्यों
तलाशता हूँ मैं इस कदर
जैसे जानता नहीं
मौत ही है आखरी डगर ।
हंसने की वजह क्यों
ढूढता हूँ मैं हूँ इधर उधर
जैसे जानता नहीं
ख़ुशी वहीँ है देखूं जिधर।
उड़ने को रहता हूँ क्यों
बेताब बेहिसाब मैं इस क़दर
जैसे जानता नहीं
रहना यहॉ जमीं पर उम्र भर।
चमकने को रहता हूँ क्यों
मैं इतना बेहद बेसबर
जैसे जानता नहीं
मैं उस जुगनू का क्या होता हशर।
-विशाल "बेफिक्र"
मुझे रात के आने से
मुश्किल नहीं है,
मुझे रात के छाने से
मुश्किल नहीं है।
मुश्किल है तो बस
इतनी सी जनाब
रात आती है मेरी तो
ढलती नहीं है,
रात आती है मेरी तो
कटती नहीं है।
-विशाल "बेफिक्र"
गुजारा तब भी हुआ करता था
जब हमें,
दो रोटी एक प्याज संग नमक
मिल जाया करता था,
माँ का प्यार और पिता का दुलार
मिल जाया करता था,
भाई और बहिन का सारा संसार
मिल जाया करता था।
क्या हुआ अचानक हमको
ए मेरे यार अब,
सब कुछ तो है मेरे पास पर वो
प्यार नहीं है,
दुलार नहीं है,
संसार नहीं है।
-विशाल "बेफिक्र"
मैं चित्रकार हूँ
न कर मुझसे कोई उम्मीद , मित्र
कर सकते हैं कुछ बयाँ
गर तो कर सकते मेरे चित्र।
मैं गीतकार हूँ
न करो मुझसे किसी की आस, मीत
कर सकते हैं कुछ बयाँ
गर तो कर सकते मेरे गीत।
मैं शिल्पकार हूँ
न कर सकता ईमारत की संरचना
कर सकती है कुछ बयाँ
गर तो कर सकती मेरी कल्पना।
मैं कलाकार हूँ
न कर सकता मैं किसी का भला
कर सकती है कुछ बयाँ
गर तो कर सकती मेरी कला।
मैं रचनाकार हूँ
न करो मुझसे किसी मर्म की आस
कर सकते हैं कुछ बयाँ
गर तो कर सकते ये एहसास।
-विशाल "बेफिक्र"