तेरा चेहरा ज्यों देखा
मैं सो न सका तबसे।
तेरी आँखें जब से देखी।
मैं कुछ देख न सका तबसे
तेरा दीदार-ए-हुस्न क्या हुआ
मैं खुद कोरोक न सका तबसे।
तेरी बातें जब से सुनी
मैं कुछ कह न सका तबसे।
तेरी जुल्फ़ें जबसे खुलीं
मैं भूल गया सब तबसे।
तेरी अदाएं जब से बढ़ीं
मैं कैसी उम्मीद मैं हूँ तबसे।
तेरा मिलना क्या हुआ
मैं तनहा था लगा क्यों बरसों से।
विशाल "बेफिक्र"
Saturday, September 17, 2016
मैं तनहा था बरसों से
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जब जागेंगे, तब दिन-रात का सोचेंगे, रातों में नींद, आती नही मुझे आजकल... दिन में आई है नींद, तो अब रात हुई है मेरी । #NightShift
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कैसे हैं हम क्या हाल है मेरा, मत पूछो अब मस्जिद जाता हूँ, कैसे तेरे घर पहुंच जाता हूँ ।
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