कुछ सोचकर
मैं चल रहा
मेरी न किसी
से होड़ है,
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राहों में छोड़ आए कुछ हमसफर को
मंजिल पे मिलेंगे कुछ खास फिर ये क्यों
जब मंजिल पे पहुँचे तो खाली हम ही थे
हम खास थे मगर कोई पास आम ना था l
तरसते रहे एक अदद बात को मुलाक़ात को
दिल में ना शांत होने वाले गुबार को लिए
कहने को वहाँ मुँह बहुत बड़ा था मेरा मगर
सुनने को मेरी बात कोई कान ना था वहाँ l
मायूसी में जब कुछ काम ना आया जब
सुनने मेरी जब व्यथा ना कोई आया तब
रोया भर के आँसू आंखों में भरी महफिलों में
देखने को तमाम मगर पोंछने को हाथ न था l
ये चार दिन की चाँदनी है अँधेरी रातें बाकी हैं
इन राहों में जी ले जिंदगी मंजिल मिल ही जाएगी
कभी तू भी कुछ भूल कभी वो भी कुछ भूलेंगे
खाई बनी है दरमियान वो धीमे धीमे भर ही जाएगी l
सुकून कहीं मिला था
किसी की बाहों में
वो पीपल की छांव में
वो बहती हवाओं में
शायद अपने ही गाँव में ।
जुनून कभी चढ़ा था
कुछ बनने का हम पर
कभी पैसों की अड़चन में
कभी खुदी की उलझन में
शायद अपने ही बचपन में ।
प्रेम कभी हुआ था
कभी अम्मा के आँचल से
कभी बापू के गुस्साने से
कभी अपने कुछ यारों से
शायद अपने ही दामन से ।
-विशाल "बेफ़िक्र"
परिंदों की भी क्या उड़ान होती होगी
पंखों में न सही इरादों में जान होती होगी,
उड़ जाते दूर वो मीलों के सफर पे
मजहबी सीमाएं भी उनसे परेशान होती होंगी ।
-विशाल "बेफ़िक्र"
बेख़बर दुनिया से होके
मैं चलता रहा,
बेसबर सब्रों को खोके
मैं चलता रहा ।
बस तेरी याद जो आयी
मैं चलता रहा,
एक तेरी राह देखी उसपे
मैं चलता रहा ।
मुश्किल है राह
चले जाइये ।
करना था वो अब
कर जाइये ।
ऊंची है मंजिल
चढ जाइये ।
न मिले सुकूँ वहाँ
उतर जाइये ।
ख्वाइश छोटी सी
कर जाइये ।
कुछ अपनी पसंद
भी फरमाइए।
बहुत किया ना-ना
हाँ कर जाइये ।
सपनों पे अपने अब
मर जाइये ।
घुटन है अंदर बहुत
बाहर आइये।
नींदों में सोए बेमतलब से
जाग जाइये ।
चुभन है अपनो की
थोड़ा सहलाइये।
दूर तो बरसों से हैं अब
पास आइये ।
वक़्त रुकता नहीं, ज़रा
रुक जाइये ।
क्या मिला ज़िद में?थोड़ा
झुक जाइए ।
बांटो मुझे !
पर मैं कब बंटता हूँ ।
क़ैद करो !
दीवारों में कब सटता हूँ ।
ढूँढो मुझे !
मैं तुझमे ही बसता हूँ ।
पहचानो !
इंसानों सा ही लगता हूँ ।
इन मज़हब के उन्मादो में कोई
कब चैन पाया है ।
कहीं राम कहीं खुदा ये देख आज
खूब शरमाया है ।
सेंकी थी रोटी स्वारथ की जिसने
उन्माद की इस आग में
क्या भूखे कमजोर का उससे कभी
पेट भरपाया है ।
मजहब की दीवारों पे अब तो
हुक्मरानों का भी साया है ।
करते थे बातें दीवारों के जरिये अबतो
उन सूराखों को भी भरवाया है ।
हाँ हमसे एक भूल हुई घर बनाते
समय इस हसीं दुनिया में
इमारत को ऊंचा करते रहे और
नींव को न भरवाया है ।
परिंदों सी उड़ान भर के
साख पे मैं आन बैठा ।
देख दुनिया के रंग कई मैं
तेरे दर पे आन बैठा ।
ये तेरी मर्जी है ए मेरे खुदा
अपनाये या न अपनाये,
मैं सब भूल ,सब छोड़छाड़
तेरे घर पे आन बैठा ।
देख दुनिया की उदासी
मैं उदास होता हूँ
हंसे जब दुनिया खुलके
मैं उपहास होता हूँ।
दुनिया जब खोये जुबाँ
मैं आवाज़ होता हूँ।
थक के थमे दुनिया तब
मैं आगाज़ होता हूँ।
टूटे हो जब सारे सपने
मैं विश्वास होता हूँ।
जी पड़े जिसे लेके दुनिया
मैं वो साँस होता हूँ।
मुनासिब न जाना अपनों ने जीते जी
कि हाल पूछ ले कभी मेरा एक बार ।
मरके अपनी दौलत पे देखा है जमावड़ा
लड़ना-झगड़ना अब उनका कइयों बार ।
मैं तो अब इन बातों से उबर चुका हूँ
चढ़नी थी जो इमारत चढ़ चुका हूं ।
उस खुदा की असीम दौलत पाकर मैं
इस झूठी दौलत से तौबा कर चुका हूं।
गज़ब कयामत भी होगी
जो कभी आती नही है ।
जुल्मी गुनाहगारों ने उसको भी
शायद घूस दे रखी है ।
बिकी तो मौत भी है शायद
जो उनको आती नही है ।
जिंदगी जी रहे हैं किराये पर
तकादे को कोई नही है।
हुंकार भरो
जयकार करो,
मन के भय
का संहार करो ।
वृद्ध पड़े
इस यौवन में,
नव शक्ति
का संचार करो ।
क्षुब्ध पड़े
हो कब से तुम,
मन-मंदिर
का उद्धार करो ।
शोक करो
मृत का भी न,
फलते जीवन
का रसपान करो ।
बोझिल हो
औरों पे कबसे?
स्वतंत्र हो
न भार बनो ।
हारे हो
कई बार मगर,
जीतने की इच्छा
हर बार करो ।
खोया है अब
तक बस पाने में,
मिल जाएगा
खुद को तैयार करो ।
वजूद तेरा भी,
दो एक पल ही
कुछ ज्यादा होगा मुझसे !
फिर क्यों ये
गुरूर किस बात का तुम
पाले फिरते हो !
कदम चार कदम
पे मंजिल है मेरी ,
तेरी भी क्या कुछ दूर है?
फिर क्यों राहों में,
हमसे तुम बेमतलब
यूँ उलझा करते हो !
वक़्त गुलाम है तेरा ,
अभी शायद लेकिन
मैं भी मालिक से कम क्या?
तुझसे आज़ाद हो,
मानेगा वो हुक्म मेरा भी
ये वादा करता हूँ !
-विशाल 'बेफ़िक्र'