बेफ़िक्र आवारा
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Thursday, July 30, 2020
दास्ताँ
वैसे तो कलम से लिखी जाती हैं दास्ताँ, पर ज़िक्र हौंसलों का ही होता है वहाँ !
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तेरे घर पहुंच जाता हूँ
कैसे हैं हम क्या हाल है मेरा, मत पूछो अब मस्जिद जाता हूँ, कैसे तेरे घर पहुंच जाता हूँ ।
चश्मे खुशफहमी के आंखों में न रहेंगे ।
1. हुक्मरानों के तब तख्तोताज हिलेंगे... जब चश्मे खुशफहमी के आंखों में न रहेंगे । 2. तक़दीर इस कदर सोई है मेरी... उसको जगाने में, मैं भी सो...
अश्कों की खातिर
तेरी हर ख़्वाहिश को पूरा करने को ये दिल चाहता है तुझसे मुहब्बत की आजमाइश को ये दिल चाहता है मुकम्मल जहाँ तब होगा नसीब ऐ मेरे यार अपना तो...
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