बेफ़िक्र आवारा
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Thursday, July 30, 2020
दास्ताँ
वैसे तो कलम से लिखी जाती हैं दास्ताँ, पर ज़िक्र हौंसलों का ही होता है वहाँ !
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आशिक़ी
आशिकी इक धुंआ है 'बेफ़िक्र' साँस लेने नही देती, दम ये घोंट देती है
(no title)
झूठी दौलत झूठे रिश्ते
मुनासिब न जाना अपनों ने जीते जी कि हाल पूछ ले कभी मेरा एक बार । मरके अपनी दौलत पे देखा है जमावड़ा लड़ना-झगड़ना अब उनका कइयों बार । मैं ...
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