Thursday, July 30, 2020

मंजिल

मंज़िल पे क्या रखा है....
मजे जब रास्तों में ही सारे हों ।

किस्मत

किस्मत में जो है वो मिलेगा ही..
मेहनत करले किस्मत बदलते देर नही लगती ।

ख्वाब

ख्वाब रात में आये तो ख्वाब ही रहते हैं....
दिन में अगर देखो तो जीवन खराब करते है ।

बेकार

जिंदगी की दौड़ में भागते रहो....
रुकोगे तो ज़माना तुमको बेकार मानेगा ।

जुस्तजू

जोश जोश में होश का ख्याल रख....
बेहोश होगा तो होश में आने की जुस्तजू करेगा ।

Daily Editorials

Daily Editorials
1. Trouble in Nepal: On Nepal Communist Party factional fight
2. Fall from grace: On Malaysian ex-PM Najib Razak
3. Reputation of scientists will be further muddied by our role in this pandemic
4. Regulations proposed by draft report on non-personal data need a relook
5. If we can coexist with animals, we will benefit far more than them

मुद्दतो बाद तुम आये

मुद्दतो बाद तुम आये....
आकर बस जाने की बात ही की ।

12 HeHeHe...

12 HeHeHe...

Lake Buka : Chhattisgarh

Lake Buka : Chhattisgarh

दास्ताँ

वैसे तो कलम से लिखी जाती हैं दास्ताँ, पर ज़िक्र हौंसलों का ही होता है वहाँ !

Saturday, January 26, 2019

देखने को तमाम मगर पोंछने को हाथ न था

राहों में छोड़ आए कुछ हमसफर को
मंजिल पे मिलेंगे कुछ खास फिर ये क्यों
जब मंजिल पे पहुँचे तो खाली हम ही थे
हम खास थे मगर कोई पास आम ना था l

तरसते रहे एक अदद बात को मुलाक़ात  को
दिल में ना शांत होने वाले गुबार को लिए
कहने को वहाँ मुँह बहुत बड़ा था मेरा मगर
सुनने को मेरी बात कोई कान ना था वहाँ l

मायूसी में जब कुछ काम ना आया जब
सुनने मेरी जब व्यथा ना कोई आया तब
रोया भर के आँसू आंखों में भरी महफिलों में
देखने को तमाम मगर पोंछने को हाथ न था l

ये चार दिन की चाँदनी है अँधेरी रातें बाकी हैं
इन राहों में जी ले जिंदगी मंजिल मिल ही जाएगी
कभी तू भी कुछ भूल कभी वो भी कुछ भूलेंगे
खाई बनी है दरमियान वो धीमे धीमे भर ही जाएगी l

Friday, January 11, 2019

धुआँ धुआँ जल के जो ये राख बच गयी,
ये मेरी ज़िंदगी की कुछ आस बच गयी ।
क़यामत आने से जो जलजला बना था,
उस जलजले से बस कुछ आग बुझ गयी ।

Saturday, December 22, 2018

खुद वो आग बनो

सन्नाटा है जोर का
कोई  तो आवाज़ करो
सोया है जग नींद में
तुम ही शंखनाद करो ।

खिन्न है मन क्यूँ तेरा
खुद ही उपहास बनो
हँस कर चल पड़े जहाँ
तुम वो आग़ाज़ बनो ।

जिस्म से रिसता नहीं अब
लहू न तेरा न ही अब मेरा
धधके ज्वाला सी हृदय में
तुम ख़ुद वो ऐसी आग बनो ।

कठिन सफ़र देख लौटे क्यूँ तुम
यूँ रस्ते पे ही दम तोड़ दिए
चलते रहते यूँ ही राहों में बस 
इरादा मंजिल पाने का हर बार करो ।

Friday, December 21, 2018

शायद अपने गाँव मे

सुकून कहीं मिला था
किसी की बाहों में
वो पीपल की छांव में
वो बहती हवाओं में
शायद अपने ही गाँव में ।

जुनून कभी चढ़ा था
कुछ बनने का हम पर
कभी पैसों की अड़चन में
कभी खुदी की उलझन में
शायद अपने ही बचपन में ।

प्रेम कभी हुआ था
कभी अम्मा के आँचल से
कभी बापू के गुस्साने से
कभी अपने कुछ यारों से
शायद अपने ही दामन से ।

-विशाल "बेफ़िक्र"

Wednesday, December 12, 2018

मीलों का सफर

परिंदों की भी क्या उड़ान होती होगी
पंखों में न सही इरादों में जान होती होगी,
उड़ जाते दूर वो मीलों के सफर पे
मजहबी सीमाएं भी उनसे परेशान होती होंगी ।

-विशाल "बेफ़िक्र"

Saturday, June 30, 2018

मैं चलता रहा

बेख़बर दुनिया से होके
मैं चलता रहा,
बेसबर सब्रों को खोके
मैं चलता रहा ।
बस तेरी याद जो आयी
मैं चलता रहा,
एक तेरी राह देखी उसपे
मैं चलता रहा ।

Saturday, March 31, 2018

झुक जाइये

मुश्किल है राह
चले जाइये ।
करना था वो अब
कर जाइये ।

ऊंची है मंजिल
चढ जाइये ।
न मिले सुकूँ वहाँ
उतर जाइये ।

ख्वाइश छोटी सी
कर जाइये ।
कुछ अपनी पसंद
भी फरमाइए।

बहुत किया ना-ना
हाँ कर जाइये ।
सपनों पे अपने अब
मर जाइये ।

घुटन है अंदर बहुत
बाहर आइये।
नींदों में सोए बेमतलब से
जाग जाइये ।

चुभन है अपनो की
थोड़ा सहलाइये।
दूर तो बरसों से हैं अब
पास आइये ।

वक़्त रुकता नहीं, ज़रा
रुक जाइये ।
क्या मिला ज़िद में?थोड़ा
झुक जाइए ।

Friday, March 30, 2018

इंसानों सा लगता हूँ

बांटो मुझे !
पर मैं कब बंटता हूँ ।
क़ैद करो !
दीवारों में कब सटता हूँ ।

ढूँढो मुझे !
मैं तुझमे ही बसता हूँ ।
पहचानो !
इंसानों सा ही लगता हूँ ।

Thursday, March 29, 2018

नींव

इन मज़हब के उन्मादो में कोई
कब चैन पाया है ।
कहीं राम कहीं खुदा ये देख आज
खूब शरमाया है ।

सेंकी थी रोटी स्वारथ की जिसने
उन्माद की इस आग में
क्या भूखे कमजोर का उससे कभी
पेट भरपाया है ।

मजहब की दीवारों पे अब तो
हुक्मरानों का भी साया है ।
करते थे बातें दीवारों के जरिये अबतो
उन सूराखों को भी भरवाया है ।

हाँ हमसे एक भूल हुई घर बनाते
समय इस हसीं दुनिया में
इमारत को ऊंचा करते रहे और
नींव को न भरवाया है ।


साख पे में आन बैठा

परिंदों सी उड़ान भर के
साख पे मैं आन बैठा ।
देख दुनिया के रंग कई मैं
तेरे दर पे आन बैठा ।

ये तेरी मर्जी है ए मेरे खुदा
अपनाये या न अपनाये,
मैं सब भूल ,सब छोड़छाड़
तेरे घर पे आन बैठा ।

उपहास होता हूँ

देख दुनिया की उदासी
मैं उदास होता हूँ
हंसे जब दुनिया खुलके
मैं उपहास होता हूँ।

दुनिया जब खोये जुबाँ
मैं आवाज़ होता हूँ।
थक के थमे दुनिया तब
मैं आगाज़ होता हूँ।

टूटे हो जब सारे सपने
मैं विश्वास होता हूँ।
जी पड़े जिसे लेके दुनिया
मैं वो साँस होता हूँ।

झूठी दौलत झूठे रिश्ते


मुनासिब न जाना अपनों ने जीते जी
कि हाल पूछ ले कभी मेरा एक बार ।
मरके अपनी दौलत पे देखा है जमावड़ा
लड़ना-झगड़ना अब उनका कइयों बार ।

मैं तो अब इन बातों से उबर चुका हूँ
चढ़नी थी जो इमारत चढ़ चुका हूं ।
उस खुदा की असीम दौलत पाकर मैं
इस झूठी दौलत से तौबा कर चुका हूं।

Tuesday, March 27, 2018

बिकी हुई क़यामत

गज़ब कयामत भी होगी
जो कभी आती नही है ।
जुल्मी गुनाहगारों ने  उसको भी
शायद घूस दे रखी है ।

बिकी तो मौत भी है शायद
जो उनको आती नही है ।
जिंदगी जी रहे हैं किराये पर
तकादे को कोई नही है।

Wednesday, March 21, 2018

हुंकार भरो !

हुंकार भरो
जयकार करो,
मन के भय
का संहार करो ।

वृद्ध पड़े
इस यौवन में,
नव शक्ति
का संचार करो ।

क्षुब्ध पड़े
हो कब से तुम,
मन-मंदिर
का उद्धार करो ।

शोक करो
मृत का भी न,
फलते जीवन
का रसपान करो ।

बोझिल हो
औरों पे कबसे?
स्वतंत्र हो
न भार बनो ।

हारे हो
कई बार मगर,
जीतने की इच्छा
हर बार करो ।

खोया है अब
तक बस पाने में,
मिल जाएगा
खुद को तैयार करो ।

गुरूर

वजूद तेरा भी,
दो एक पल  ही
कुछ ज्यादा होगा मुझसे !
फिर क्यों ये
गुरूर किस बात का तुम
पाले फिरते हो !

कदम चार कदम
पे मंजिल है मेरी ,
तेरी भी क्या कुछ दूर है?
फिर क्यों राहों में,
हमसे तुम बेमतलब
यूँ उलझा करते हो !

वक़्त गुलाम है तेरा ,
अभी शायद लेकिन
मैं भी मालिक से कम क्या?
तुझसे आज़ाद हो,
मानेगा वो हुक्म मेरा भी
ये वादा करता हूँ !

-विशाल 'बेफ़िक्र'

Sunday, March 18, 2018

मत नाम बना बेईमानों में !

मैं उसको ढूंढता रहा बस,
हर राह में ,और हर मंजिल में ।
वो मिला भी तभी मुझे,
जो झांका था खुदके दिल में ।

मन्दिर-मजारों पे टेका था,
सर मैंने अपना तो कईयों बार ।
झुका न सका सर ये कभी,
झुकना जहाँ था इसे हर बार ।

मजहब बना हमारे लिए था,
कब से हम जीने लगे उसके लिए ।
दो प्यार के बोल काफी थे,
चैन से जीने और मरने के लिए ।

जोड़ो अगर जुड़ता है जो,
कोशिश करो तुम बस इसके लिए ।
टूटे हैं सब, और रूठे भी हैं,
जैसे बैठे हों खुद जुड़ने के लिए ।

मन विचलित है, भयभीत भी,
स्थिर मन किसका कब रहता है ।
सम्यक मार्ग , संयत कर्म से
हर मुश्किल का हल बनता है ।

खोजो अपने को, पाओ ऊंचाई,
नापों अपने को नित नए पैमानों में।
ढूँढो खुदको , पाओ सच्चाई,
मत नाम बना खुदका तू बेईमानों में ।

Wednesday, March 14, 2018

उन पन्नो को मैं कुछ तो भर आता हूँ!

फिर से ज़िन्दगी को 
मैं जी आता हूँ,
बासी रिश्तों को ताजा 
मैं कर आता हूँ।
उन कोरे पन्नो पे कुछ 
लिखना था कभी,
उन पन्नो को कुछ तो 
मैं भर आता हूँ।

कहना बहुत था लेकिन
किसको और कितना?
भूल लाज-शर्म अब वो 
मैं कह ही आता हूँ।
फासलें पनपेते अपनों में,
किसी वजह से,
जाने-अनजाने के फासलों को 
मैं पाट आता हूँ।

बहुत रह लिए गुमराह होकर  
खुद की सच्चाई से,
झूठों के पर्दों से बेनक़ाब 
मैं हो ही आता हूँ।
दुनिया मुझसे ही थी,
आ दुनिया की फिक्र  करते
उस बोझिल 'मैं' को कहीं 
अब मैं विसराता हूँ।

जो है ,वो अभी है, यहीं है,
और हमीं से है,
ये आसमां जुड़ा जब ,
कहीं तो जमीं से है ।
क्यों न मैं भी बस जीने 
भर की ही सोचूँ,
यह कहना बस ही मेरा , 
आप सभी से है।

-विशाल 'बेफ़िक्र'

Wednesday, February 28, 2018

पिघल गया हूँ

मैं कब से बदल गया?
ये जानना चाहता हूं मैं।
मैं कब से 'मैं' न रहा?
खंगालना चाहता हूं मैं।

कल ही तो तोडी थी मैंने
वो काँच वाली खिड़की ।
घर आकर पड़ी थी मुझपे
पापा की मार और घुड़की ।

तभी आँचल में खींचके दी
थी माँ ने प्यार की थपकी ।
'डांटूंगी तेरे पापा को कैसे दी
मेरे लाल को ये घुड़की' ।

अभी तो यारों के संग बैठ
कर रहा गप्पें-बातें था हज़ार ।
वो स्कूल टीचर की नकल
उतारी मैने थी कई एक बार।

कल ही तो गया था कॉलिज
मस्ती-मजा किया था पहली बार।
'अभी तो दिन हैं अपने यारों
पैसा-रुतबा है अपने लिए सब बेकार'।

पर अब खोया सा हूँ मैं
सोया सा हूँ जागे हैं सब ।
पीछे कैसे छूट गया वो जो
कल तक था मेरा सब ।

मैं तब भी 'मैं' था और
मैं अब भी 'मैं' ही  हूँ ।
उस मैं को दफनाकर अब
इस 'मैं'  में ही बदल गया हूँ।

हाँ मैं अब बदल गया हूँ
मैं खुद को निगल गया हूँ।
तब 'मनमानी' करने वाला
हालातों में पिघल गया हूँ।

-विशाल 'बेफ़िक्र'

मौसम

मौसम का मिज़ाज़ भी क्या है?
कोई क्या समझ पाया है?
कभी गर्माती धूप, कभी ठिठुरन
तो कभी शांत छाया है  ।

कभी पतझड़ , कभी नव कोंपल
ये हर वक़्त लाया है ।
विरह-मिलन, सुख-दुख आएंगे
जीवन को समझाया है ।

तूफान बन, अपनी में ही बस धुन
कहर खूब बरपाया है ।
बारिश बन ,फिर अपनी करनी पर
आँसूं भी खूब बहाया है ।

बादल सा फिर  उमड़ उमड़ कर
हर तरफ शोर मचाया है।
मौसम है ये, बदलेगा हर पल ये
इसे कौन समझ पाया है।

बदलो मत, पर सीखो जज्बे को
जिसने दुनिया को घुमाया है।

-विशाल 'बेफ़िक्र'

Monday, February 5, 2018

चाहिए वो जुनून है!

परिस्थिति पहाड़ हो
कुदरत की लताड़ हो ,
दृष्टि ओझल हो
राह बोझिल हो ,

तन-पीड़ा असहाय हो
जीने का न उपाय हो ,
मन बड़ा अशांत हो
मांगता बस एकांत हो,

तू निडर बढ़े जा
कर्म भर किये जा,
है ज़िगर तेरा भी
मत डर तू ज़रा भी,

खौलता जो खून है
चाहिए वो जुनून है।

-बेफ़िक्र

उतना तू भी

चुभन जितनी सीने में मेरे
चुभन होगी उतनीें तेरे भी,
घुटन जितनी है मुझे भी
घुटन होगी उतनी तुझे भी,
शर्मिंदा जितना हूँ मैं
शर्मिंदा होगा उतना तू भी,
जिंदा मरके जितना हूँ मै
जिंदा होगा उतना तू भी ।
-बेफ़िक्र

Sunday, February 4, 2018

कहाँ अब???

मन-प्रसून प्रफुल्लित ,
     कहाँ अब?
हृदय-उपवन सा
     उजड़ा हो जब ।
जीवन-नीरद सा भरा ,
     कहाँ अब?
आत्मा-धरा सी
     शुष्क पड़ी जब ।
उत्साह-पवन जीवित ,
     कहाँ अब?
अवसाद-शूल सा
     चुभा पड़ा जब ।

Monday, January 29, 2018

तो भी क्या?

मन में हो
चाहे पीड़ा अपार
जीना हो अब
कितना भी दुश्वार ,
तो भी क्या?
हँसते हँसते
जीना तो होगा
हर गम को
पीना तो होगा ।

जाने से उनके
रहना है मुश्किल
उठता है दर्द
दुखता है ये दिल,
तो भी क्या?
कुछ उनको
कुछ मुझको भी
सहना तो होगा
विरह-राह पे
चलना तो होगा ।

Sunday, January 28, 2018

पर कहीं शोर हो जाता है !

चीख पुकार और
     मातम का मरना ,
हृदय विदारक
     अनहोनी वो घटना ,
अब मन का इन
     बातों से 'न' डरना ,
गर्म लहू का बेबस
     नसों में  जमना ,
देश-प्रेम का बस
     'नारों' में घर करना ,
कलम दवात का
     हुक्मरानों से रुकना ,
बुलंद आवाज़ों का
     दहशत से दबना ,
पग-पग पल-पल
     सहमे से रहना ,
देशभक्ति हेतु
     साक्ष्यों का रखना ,
'छ्द्म ' आज़ादी को
      वीरों का  मरना ,
भ्रष्टाचार का 'धन' से
      'मन' में घर करना ,
ज़िक्र इतिहासों का
      स्वार्थ से ही करना ,
अराजकता से हुकूमत
     नतमस्तक हो जाना,
जमीरों का बस,
     अंध-मरण हो जाना,
दुनिया का एकदूजे
     से होना बेगाना,
पर -पीड़ा पे ही
     प्रीत जताना ,
दुनिया का इस स्तर
     तक गिर जाना ,
गलत देख कर
     आंख भी न झपकाना,
सब देख मन
     मेरा तो घबराता है
सब सोच हृदय
    विदीर्ण सा हो जाता है
आह निकलती है
    लेकिन फिर से
    कहीं शोर हो जाता है,
    कहीं शोर हो जाता है ।
    
    

    

Sunday, January 21, 2018

बेतरतीब

"ज़िंदगी गुज़ार दी
हमें गिराने किसी
अंधे कुंएं में ,
गहराई बढ़ाने उसकी
हो गए दफन
खुद खोदते खोदते "

'वक़्त के बदलने का इंतजार
यूँ न कर तू बेसबर होके,
कहीं वक़्त भी खुद तेरे बदलाव की
राह न देख रहा हो '

Saturday, January 13, 2018

फ़ितरत

फ़ितरत गुल-ए-गुलज़ार की भी क्या अजीब होती है तोड़ने वाले के सामने भी गम नही मुस्कान ही होती है

Friday, January 12, 2018

कभी उतर के तो देखो

बेगुनाही का यूँ क्यों सबूत मांगते हो
कितना गहरा है समन्दर
कभी उतर कर तो देखो
उन बेताब लहरों से क्या टटोलते हो
तूफान दफन है कहीं पर
कभी मन-समंदर तो देखो ।

Friday, September 15, 2017

हर आते त्यौहार में

हरी भरी जमीं 
खुला नीला आसमां
मस्त ठंडी हवा
परिंदों का जहां 
बैठा है इंतज़ार में
हर आते त्यौहार में ।

मीठा ये जामुन
वो खट्टे से बेर
मौसमी आम
बातों का झाम
गुमसुम हैं याद में
मांगे तुझे फरियाद में ।

पथराई वो आंखें
झुर्री वाले गाल
झुकी कमर 
और पके हुए बाल
हर घड़ी निहारते डगर
रहती तेरे आने की फ़िकर ।

सूना आंगन
बंजर अब खेत
चलती जो गाड़ी
उड़ती बस रेत
अपने हालात पे जो है शर्मिंदा
मृत है, बस है थोड़ी सी ज़िंदा ।

पुकारते तुझे
हर आते त्यौहार में,
हर आते त्यौहार में ।

-"बेफ़िक्र"






बुलेट ट्रेन-सौतन

जीर्ण शीर्ण सी हालत मेरी,
और तुम!
मेरी सौतन क्यों लाते हो?
रुक कर झुक कर चलती मैं,
क्यों तुम!
मुझे वैद्य पे न ले जाते हो ?

सुना बड़े बलवीर हो तुम,
फिर क्यों!
कायरता पे यूँ इतराते हो ?
हृदय-प्रिय जो कभी थी मैं
क्यों आज!
सौतन का गृह-प्रवेश कराते हो?

अपनों को छोड़ गैरों की राह
पर क्यूँ तुम!
तुम छोड़ मुझे चले जाते हो
दुर्दशा देख ऐसी मेरी तुम
शायद तुम!
खुद से ही बेशर्मी से शर्माते हो।

ज्यादा न सोचो मेरे बारे में तुम
अब क्या?
मैं तो नीरस जीवन जी ही लूँगी
दीन, दुखी, अबलों, विकलों को
मैं ढोती हूँ!
आगे भी बिन मुंह खोले ढो ही लूँगी।

Thursday, September 14, 2017

क्षमा माँगती हिंदी

मैं हिंदी हूँ,क्षमा प्रार्थी हूँ
उस युग की जिसने मेरा
उद्भव, पोषण कर के
आज यहाँ जीवंत रखा ।

मुझमें ही रहा दोष जो
इस युग में संकुचाकर भी
शोषण, तिरस्कार जो
हर पल हर पग मैने सहा ।

समय अनवरत है जो चलता
रहा बिन रुके और थके
भूल समझती हूँ मैं अपनी तो
सब बदले जो मैं न बदली ।

अपनी ही उन स्वर्णिम यादों
के उन पल में खोई सी
छोड़ चली अपना सब कुछ
थी शायद थोड़ी सी पगली ।

मेरा क्या ?मेरी बहनों का
भी मेरे जैसा ही हाल है
बोलने लिखने में लोगों की शर्म
से उनका भी बुरा हाल है ।

काश हम भी पाश्चात्य हो
जाते अंग्रेजी की तरह
नई भाषा समझ सीखते सब
करते न कोई हमसे सवाल है ।

-बेफ़िक्र

Saturday, September 9, 2017

आवाज़ों को दबते देखा है !

कहीं दूर किसी डगर पर
बस्ती जो कभी हुआ करती थी,
आज वहाँ जाती उस पगडंडी
के अवशेष मैं ढूँढा करता हूँ ।

सींचा था  जो प्रेम-स्नेह
परवाह न निज स्वार्थ कर,
वो सब समझाऊँ कैसे ,किसे ?
जब खुद कुंठित सा बैठा हूँ ।

बहु-विचार बहु-आयाम कभी
होते थे गहने वाद-विवादों के,
अब तो सारे मंचों से मैंने तो
उन आवाज़ों को दबते देखा है ।

सादा सा जीवन ऊंचे वो विचार
थी आदर्शवाद की जो पहचान,
झूठी शान,क्षणभंगुर मान के लिए
उस पहचान को मिटते देखा है ।

प्रथम देश , गौण है बाकी सब
इससे हम अब तक एकरूप रहे,
छद्मता ने अब तो हमारी उस
राष्ट्र-भक्ति को भी तौले रखा है ।

चिड़ियों की मीठी ध्वनि सुन सुबह
होती थी रोज कभी मेरी तब,
अब उनकी जगह करुण-क्रंदन करते
कौवे की कर्कशता सुना करता हूँ ।

पुराना दौर था पर दायरा बड़ा था
हर पग पे कोई सिद्धांत अड़ा था,
बेशर्म, बेअदब इस दौर को सिद्धांतों के
दायरों में छिद्र करते  मैंने देखा है।

Thursday, September 7, 2017

भूख और बेबसी

खाने का निवाला नसीब न जिनको
सोये जो रात , जिन्हें नींद कहाँ आयी है
ऐंठन सी उठती है पेट में उनके ,क्योंकि
पेट मे सिर्फ बेबसी और लाचारी समायी है ।

उठ उठ कर , जाग जाग कर उनकी ये
रातें तो कटती हैं, कट ही जाएंगी आगे भी
मिले वक़्त ,पूछो उनसे तुम बस इतना ही
रातों में नींद, उन्हें कितने पहर ही आयी है ।

रोटी की कीमत क्या होती है, जानोगे जब
उस दिन ,भर पेट भी नींद गायब होगी आंखों से
रात के उन सन्नाटों में ,जैसे खोजोगे वो दिन
जब कोई बेबस, तड़पता, मरता भूख से उन दिन ।

Wednesday, September 6, 2017

तंत्र की विफलता है

कथन वचन या मंथन
सब के सब बेमानी हैं
कट्टरता घृणा उन्माद का
भी क्या कोई सानी है ।

वाद विवाद या संवाद
से भी कुछ होता है
चीख चिल्लाहट से तोे हमने
देखा बस सच खोता है ।

'पहले आप'  की तहजीब
शायद अब सो गई है
मैं पहले , मेरा ही पहले अब
हो ऐसा, न तो शामत आई है ।

मानते हममे विचार, प्रकार
और आचार की बहुलता है
दबे विचार, सहमे प्रकार आज
इस तंत्र की विफलता है ।