बेफ़िक्र आवारा
कविताएं कहानियाँ संस्मरण अनुभव
Saturday, January 13, 2018
फ़ितरत
फ़ितरत गुल-ए-गुलज़ार की भी क्या अजीब होती है तोड़ने वाले के सामने भी गम नही मुस्कान ही होती है
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
आशिक़ी
आशिकी इक धुंआ है 'बेफ़िक्र' साँस लेने नही देती, दम ये घोंट देती है
(no title)
अश्कों की खातिर
तेरी हर ख़्वाहिश को पूरा करने को ये दिल चाहता है तुझसे मुहब्बत की आजमाइश को ये दिल चाहता है मुकम्मल जहाँ तब होगा नसीब ऐ मेरे यार अपना तो...
No comments:
Post a Comment